देश बचाकर और लड़ेंगे भी ...
पूरे विश्व में आज इजरायल ही सभी दिशाओं से मुस्लिम राष्ट्र से घिरा हुआ है और उनके अनेक सतत आक्रमणों से परेशान भी रहता है । मगर राष्ट्रीय इच्छाशक्ती और जनता के अनुपम धैर्य, साहस से वह प्रत्येक हमले पर पलटवार भी करता है और हमेश ना केवल यशस्वी होते हुये आज सीना तान कर खड़ा है।
लगभग 2000 साल से विभिन्न देशों में रहे ज्यू/ज्यूश हमेशा , “कभी ना कभी तो हम अपनी भूमि पर एक राष्ट्र के नाते इकट्ठा होंगे “ यह मनीषा लेते हुए । हर साल ,एक दूसरे को याद दिलाते रहते थे।
1948 में, उनका यह सपना साकार हुआ और इजराइल देश का जन्म हुआ , कड़े संघर्ष और लंबी प्रतीक्षा के बाद प्राप्त हुआ वतन और अपनी मिट्टी का मोल वह पूरी तरह जानते थे । इसीलिए पहले दिन से ही देश सर्वतोपरी इस भूमिका का निर्वाहन सभी ने स्वीकार किया ।
इजरायल की स्थापना करने में हर ज्यू नागरिकों के साथ साथ सबसे बड़ा योगदान 1948 में अरबो से निर्णायक संघर्ष करते हुये अपनी सैन्य शक्ति का नेतृत्व करने वाले सेनापती मोसे दायन का रहा ।
अतुलनीय शौर्य, भीम पराक्रम, सक्षम युद्ध नीती के कारण वे विजय के शिल्पकार बने , जब व्यक्ति असामान्य गुणों से युक्त होता है तब उसके लिये नियमों में भी परिवर्तित किया जाता है । उपरोक्त गुण पहचान के साथ-साथ मोसे दायन की एक और पहचान थी , उनकी एक आख पर हमेशा काली पट्टी बंधी होती थी , एक युद्ध के दरमियान उनको एक आँख खोनी पड़ी थी ।
एक दृष्टि से सैन्य के सेनानी के रूप में दायित्व संभालने हेतु वह नियम के तहत असक्षम थे । फिर भी ऊनका काम इतिहास के पन्नो पर धुरंधर सेनानी की भाँति अंकित हुआ ।
सेनापती से वह राजनीति / शासन में सक्रिय हुये और वहां भी लगभग 5 साल 1953 से लेकर 1958 तक डिफेंस मिनिस्ट्रर रहे।
ऐतिहासिक सुवेज संकट का भी उन्होंने हल निकाला था। बाद में सत्ता में राजनीतिक पार्टी बदल गई , और उनकी पार्टी और उन्हें विपक्ष में बैठना पडा । फिर भी वे सतत वैज्ञानिक खेती, सैनिक प्रशिक्षण और आम सैनिकों की सुविधाओं के लिये काम करते रहे ।
फिर एक बार जब 1967 में युद्ध के बादल इजराइल पर मंडरा रहे थे , देश के रक्षा मंत्री देश की परिस्थिति को सुलझा नही पा रहे थे और सैन्य शक्ति का मनोबल दिन प्रतिदिन गिरते जा रहा था । लोगो को मोसे दायन की याद आने लगी की इस विपरीत परिस्थिती का सामना मोसे दायन ही कर सकते है ।
सैन्य और देश का मनोबल वे ही बढ़ा सकते हैं इजराइल की सुरक्षा अगर अखंड रखनी है तो इस युद्ध जीतना ही पड़ेगा यह महसूस करते हुये तत्कालीन रक्षा मंत्री ने स्वयं अपना पद छोड़कर , तब विपक्ष में बैठे “ ग्रेट मोसे दायन “ को अपने पद पर नियुक्त किया ।
पक्ष , मेरी हैसियत , लोग क्या कहेंगे, मै क्यूँ त्याग पत्र दूँ , अगर दे भी दूँ तो अपनी नजदीकी वाले को क्यूँ ना विराजमान करूँ , जिससे मेरा नियंत्रण बना रहे ऐसी कोई भी बात न सोचते हुये , राष्ट्र सर्वोपरि है यह मानते हुये रक्षा मंत्री ने एक अनुपम मिसाल रखी ।
अपने अनुभव कुशलता और जनता के विश्वास पर इस परिस्थिति से भी मोसो दायन ने इजरायल को बचाया । युद्ध जीता और देश ने विश्वास से दिये अस्थायी रक्षा मंत्री के पद का भार फिर से उन्हीं रक्षा मंत्री को सोंपते हुये एक आदर्श सैनिक तथा नागरिक का कर्तव्य निभाया ।
आज इजरायल पूरे विश्व में अपने ना केवल अपनी सामरिक ताकत पर सर्वश्रेष्ठ माना जा रहा है , मगर ये सभी नागरिकों में विचार होना की “ पद की लालसा न रखना, अपनी व्यक्तिगत मर्यादा, कुशलता का आँकलन करते हुये दायित्व स्वीकारना , समय आने पर नाकामी का सिलसिला आगे न बढाते हुये, देश ही सर्वदा सर्वोपरि है “ यह भावना रखते हुए त्याग हेतु तत्पर रहना , तभी यह संभव होता है।
यह आज याद आने का कारण :
आज पूरे विश्व Covid19 से लड़ रहा है । भारत में जो चित्र दिख रहा है , उसमें माननीय श्रद्धेय पंतप्रधान नरेंद्र मोदी जी का नेतृत्व जनता ने मान लिया है। उनके ऊपर 100 करोड़ से ज्यादा भारतवाशी का विश्वास भी है, दिन प्रति दिन श्रद्धा से उनके आदेश का पालन हो रहा है।
मगर हमारी लोकतंत्र प्रणाली के अनुसार कुछ राज्यों में विभिन्न विचारों की सरकार कार्यरत है जो इस गंभीर और अत्यंत कठिनतम संघर्ष तथा हर व्यक्ति के द्वार पर खडी मृत्यु के समय में भी अपनी कुंठित राजकीय सोच और घृणीत हरकतो से बाज नही आ रहे है, और अपनी नाकामयाबी असफलता का डंका पिटने के बाद भी , हज़ारों लोगों को मृत्यु के मुह में निर्लज्जता से ढकेल दे रहे है ।
अपनी क्षमता व कूबत के अनुसार वह इस चुनौती से लड़ तो रहे हैं मगर यह पर्याप्त नहीं है , कुछ राज्य के मुख्यमंत्री परिस्थिति का मज़ाक़ उड़ाने में तुले है जिस में दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कल आनंद नगर में जो तमाशा किया वह सरासर निंदनीय है ।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की स्तिथि ऐसी हो गई है जैसे “ जाये तो जाये कहा , करे तो करे क्या , कोई हमदम नही रहा कोई सहारा नही रहा “ , ऐसी हालत बनाकर मिडिया में दिखाई दे रहे है । महाराष्ट्र में हर रोज़ ये महामारी बढती ही जा रही है।
छत्तीसगढ़ में आंतरिक सुरक्षा खतरे में है , जिसका लाभ उठा कर फिर हिंसक नक्सलवाद पनप रहा है । पश्चिम बंग में , ममता जी ने तो उपाय से ज्यादा , केंद्र के आदेश को स्वयं की उपस्थिती में हजारो लोगो के समक्ष ठुकराने की जुर्रत कर रही है ।
तमिलनाड, बिहार, झारखंड, आंध्र, तेलंगना, महाराष्ट्र में जहाँ इस महामारी का फैलाव ज्यादा है , मस्जिदों में , विदेशी मौलवी के भेश में आये दरिंदो को बड़े साजिश के तहत , बड़ी ममता से खुलेआम गोदी में बिठाये है । वामपंथी बहुल केरल में क्या चल रहा है , “चीन ने क्या किया , जो कभी किसी को समझ में नही आये “ उस कदर की प्रतिक्रिया हो रही है ।
और इन सबका उल्लू काँग्रेस का बिगड़ा हुआ और नादान शहजादा पुरे गुलिस्ताँ को तहस नहस करने में जुटा हुआ है ।
यह सभी छोटे , झुठे, मक्कार राज्य के प्रमुख और उनका पक्ष , अपनी विफल अस्मिता के चलते अपने पद से अभी हटेंगे नही और अपनी मनमानी करते रहेंगे , क्यूँकि इस्रायल और मोसे दायन और उनकी राष्ट्र भक्ति को समझना , इनके बस की बात नही ।
अब देश का वर्तमान परिदृश्य , इस प्रकार है एक जगह जागरूक नागरिक एवं बहुत सी राज्य सरकारें , वर्तमान परिस्थिती में स्वयं प्रेरणा से और अनुशासित स्वयंसेवक के भाँति , मानवता पूर्ण व्यवहार से, सेवा भाव से स्वयं के साथ अपने राज्य, जनता, परिवार के साथ साथ , समाज और देश को बचाने में जी जान से कोशिश कर रहे है , तो दूसरी तरफ़ कई धार्मिक उन्माद तले, दोगले पक्षीय अभिनिवेश के सहारे, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की विनाशकारी कल्पना के साथ , होश खोकर, नियम कानून अनुशासन की धज्जिया उड़ाकर, निर्लज्ज भाव से स्वयं के साथ अपने परिवार, साथ साथ समाज, राज्य, देश और अखिल मानव जाती के खिलाफ नंगा नाच कर रहे है,इन्हें ना तो दंडित होने का भय है ना तो अपमानित होने की लज्जा , ना सर्वनाशी मृत्यु का भय । मानो ये मानवीय बम बनकर मानवजाती का संहार करने वाले दानव हो गए हों ।
ऐसे मिश्रित वातावरण में भारत की आंतरीक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती, या इसके के कारण आपात्कालीन परिस्थिती का सामना करना पड सकता है । बाह्य सुरक्षा एवम सार्वभौमिकता पर भी खतरा बढ़ सकता है ।
हमारी सेना सजग है । मगर अंदरूनी हालात अगर काबू में नही रहे तो सैन्यशक्ति को तैनात करना पड़ेगा , और बाह्य शत्रु इसका फायदा लेने में तैयार ही बैठा है और उनके वफादार कुत्ते जो भारत में बुद्धिजीवी बन गली गली घुम रहे है वह देश का वातावरण और दूषित करेंगे ।
इसीलिए किसी भी राजकीय पक्ष लोकतंत्र प्रणाली से जीत कर , राज्य कर रहे हो , वह अगर हमारी जान बचाने में कर्तव्य में अक्षम हैं , तो एक बार क्षम्य है मगर किसी भी हालत में उन्हे हज़ारों जनता के जीवन मृत्यु के साथ राजनीति और सौदा करने का कोई अधिकार नही है ।
राज्य सरकार की अनदेखी, दुसरे राज्यो में फसे अपने नागरिक की चिंता न करना जब खतरेकी सूचना मिली तभी हमारे देश के मा. पंतप्रधान जी ने विभिन्न देशो से भारतीय नागरिक सभी प्रकार जोखीम उठाते हुये सुखरूप लाए, मगर राज्य सरकारे हात पे हात धरे बैठी रही और अभि सब बंद होने के बाद केंद्र सरकार को कोसते हुये जाग गयी । अब जनता का एक राज्य से दुसरे राज्य में अवागमन शांती पूर्ण तरिकेसे संभव नही है । इसलीये बहुत सी जनता कानून तोडने हेतु बेबस होती जा रही है और प्रशासन से लथाडते हुये, पुलीस कर्मीयो का मार खाने मजबूर हो गयी है । देश के प्रति चाहते हुये भी नियम का पालन नही कर पा रही है ।
उन्होने संविधान के तहत शपथ लेकर राज्य चलाने की नीती रीती ना केवल स्वयं के बलबुते पर निर्धारीत करनी है बल्कि विरोधी पक्ष के माध्यम से जनता को जवाबदेही के साथ सरकार चलानी होती है ।
उपरोक्त राज्यो में सक्षम विरोधी दल मौजूद है , जिनको बरसो से राज्य, प्रशासन चलाने का अभ्यास भी है , मगर दुर्भाग्य की बात यह है की सरकार इस आपदा में ऊनका सहयोग लेना अछूत मान रही है ।
अनेक सामाजिक संस्था हैं , जो ऐसे आपदा के समय सरकार के साथ निर्भयता तथा निर्मोही भाव से कंधे से कंधा मिलाकर काम करने हेतु सरकारी आदेश की राह देखते हुये तैनात खड़ी है ।।
सरकार, विपक्ष, प्रशासन, सामाजिक संस्था एवम नागरिक मिलकर समन्वय, सौहार्द, भाईचारा से समरस होकर सुचारु रूप से व्यापक योजना के तहत एक होकर लड़ हेतु तत्पर रहे , यह अनोखा चित्र इस कसोटी पूर्ण समय में साकार करने जो भी असक्षम है , तो उनको राज गद्दी को स्वयं त्यागना चाहिये ।
अन्यथा एक आदर्श भारतीय नागरिक के नाते घर में बैठकर , सोसिएल मीडिया के माध्यम से इस सत्य परिस्थिती को उजागर करते हुये , संविधानिक रचना के तहत उस उस राज्यपाल महोदय को निवेदन, प्रार्थना करे की हमारे राज्य की असक्षम अकर्मण्य सरकार को बरखास्त करे ।
ऐसे राज्य सरकार के खिलाफ परिस्थिती , इस से पहले की परिस्थिति वश के बाहर जाए , Go Back का नारा और अभियान चलाना होगा ।
जैसे इतिहास में जुल्मी राज सत्ता लोक क्रांती से समाप्त की जाती थी , वैस ही जानता को अगर सरकार चुनने का अधिकार है तो वैसेही अति विशिष्ट परिस्थिती में सरकार बरखास्त करने का भी अधिकार मिलना चाहिए ।
इससे भी वे अगर नही मानते है तो इस अभूतपूर्व स्थिती को सुचारू और नियंत्रित करने में हमारे , शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व सक्षम है ऊनको निर्णय तथा अमल की पुरी छूट हेतु तुरंत आपात्काल की घोषणा देश में लागू करने की विनती माननीय सर्वोच्च न्यायपालिका और सन्माननीय राष्ट्रपति महोदय और पंतप्रधान को करनी चाहीये ।
व्यक्तिगत जीवन बचे या ना बचे
पर देश बचना चाहीये ।
देश बचा तो अखिल मानवता के शत्रुओं से संग लड़कर , विश्वजननी वसुंधरा को जिताऐंगे ।
शरद चव्हाण
जागरूक भारतीय नागरिक